| Book Details | |
| Book Author | Dr. S. Irfan Basha |
| Language | Hindi |
| Book Editions | First |
| Binding Type | Hardcover |
| Pages | 192 |
| Publishing Year | 2025 |
समकालीन हिन्दी गद्य जिन नये विमर्शों के लिए चर्चित है, उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण दलित विमर्श है। दलित विमर्श की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसमें आत्मकथायें अधिक लिखी गर्मी हैं और रचनाकार की जीवनानुभूति यथार्थ के धरातल से जुड़ी है। जब जीवन का जीवन्त चित्रण होता है तो उसमें रचनाकार के अपने मनोविज्ञान का प्रभाव भी पड़त है। रचनाकार की सोच, उसके संघर्ष केवल गहरी दुनिया के नहीं उसके अंतःसंघर्ष के परिणाम होते हैं। डॉ० एस० इरफान बाशा ने इसी उद्देश्य से 'हिन्दी दलित आत्मकथाओं का मनोविलेषणात्मक अध्ययन' शोध ग्रंथ में रचनाकारों की निजी संवेदना, उनकी मनः स्थिति को विश्लेषित किया है। वस्तुतः दलित साहित्य का विकास ही मनोविज्ञान का परिणाम है। भारतीय समाज की विसंगतियों, अस्पृश्यता, भेदभाव और युगों से चलते आ रहे शोषण के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष में वे मनोवैज्ञानिक हीनता की ग्रंथियाँ भी हैं, जिसके विरुद्ध वर्तमान दलित लेखक आक्रोशित है। डॉ० बाशा ने एक ओर उन मनोग्रंथियों पर प्रकाश डाला है, तो दूसरी ओर उनकी मनोवैज्ञानिक समस्याओं का विवेचन भी किया है। वास्तव में किसी जीवन्त विमर्श को समझने में मनोविज्ञान की विशिष्ट भूमिका होती है। डॉ० बाशा का यह ग्रंथ दलित साहित्य और उसके रचनाकारों को समझने की एक नयी दृष्टि देता है। दलित साहित्य के आलोचकों के लिए यह ग्रंथ महत्त्वपूर्ण है।
डॉ० लक्ष्मीकान्त पाण्डेय